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हिमाचल में नवजात अदला-बदली पर सरकार देगी मुआवजा:डिलीवरी के बाद जिस मां के बेटा हुआ, उसे दी नवजात बच्ची; कोर्ट ने गंभीर लापरवाही माना

शिमला के कमला नेहरू अस्पताल में नवजात बच्चों की अदला-बदली मामले को अदालत ने गंभीर लापरवाही मानते हुए हिमाचल सरकार को पीड़ित मां को 30 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है। संजौली निवासी शीतल ठाकुर 26 मई 2016 को प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती हुई थीं। दरअसल, 10 साल पहले डिलीवरी के बाद परिजनों को बताया गया कि बेटा हुआ है, लेकिन कुछ देर बाद शीतल को एक नवजात बच्ची सौंप दी गई। परिवार के सवाल उठाने के बावजूद तत्काल कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पेरेंट्स का कहना था कि उन्हें प्रसव के दौरान बेटे के जन्म की जानकारी दी गई थी, जबकि अब बच्ची दी जा रही है। बच्ची के कपड़े भी बदले हुए थे। इसके बाद दंपती ने प्राइवेट लैब में DNA जांच कराई। रिपोर्ट में सामने आया कि अस्पताल से सौंपी गई बच्ची उनकी जैविक संतान नहीं थी। DNA टेस्ट ने अस्पताल की व्यवस्था पर खड़े किए सवाल मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत के हस्तक्षेप के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत दोनों नवजातों का DNA मिलान कराया गया। जांच में दोनों बच्चों के जैविक माता-पिता की पहचान हुई। इसके बाद बच्ची को उसके असली माता-पिता को सौंपा गया, जबकि शीतल और उनके परिवार को उनका बेटा मिल सका। इसके बाद शीतल ने अस्पताल की लापरवाही से हुई मानसिक पीड़ा और अपने बच्चे से लंबे समय तक दूर रहने के लिए मुआवजे की मांग करते हुए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया। सरकार ने लापरवाही से किया इनकार, कोर्ट ने दलील नहीं मानी सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अस्पताल में किसी तरह की लापरवाही से इनकार किया गया। सरकारी पक्ष ने एक महिला अटेंडेंट के बयान का हवाला देते हुए कहा कि डिलीवरी के दौरान किसी ने शिकायत नहीं की थी। कोर्ट ने सरकार की जांच रिपोर्ट और दलीलों को विश्वसनीय नहीं माना। कोर्ट ने पाया कि जांच रिपोर्ट में न तो तारीख दर्ज थी और न ही गवाहों के बयान और संबंधित दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख था। जांच किसने और कब की, इसे लेकर भी गवाह स्पष्ट जानकारी नहीं दे सके। अदालत ने कहा- सरकारी अस्पताल की लापरवाही की जिम्मेदारी सरकार की सिविल जज सुष्मिता शर्मा की अदालत ने माना कि सरकारी अस्पताल में ड्यूटी के दौरान डॉक्टरों और कर्मचारियों की लापरवाही के लिए राज्य सरकार की जिम्मेदारी बनती है। अदालत ने कहा कि अस्पताल की लापरवाही के कारण माता-पिता अपने नवजात बच्चे के प्राकृतिक प्यार और स्नेह से लंबे समय तक वंचित रहे। उन्हें गंभीर मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ा। अदालत ने नुकसान की भरपाई के लिए रेस्टिट्यूटियो इन इंटीग्रम के सिद्धांत को लागू किया। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को दूसरे की गलती या लापरवाही से हुए नुकसान की यथासंभव भरपाई की जाए। इसी आधार पर अदालत ने शीतल ठाकुर का वाद स्वीकार करते हुए हिमाचल सरकार को 30 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया।