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पंजाब- 25 साल केस लड़ा, रिटायरमेंट के बाद मिली प्रमोशन:ज्यादा अंक के बाद भी रखा जूनियर; HC ने कहा- लाभ का बकाया दे सरकार

पंजाब सरकार के एक मुलाजिम केस लड़ते-लड़ते रिटायर हो गए। 25 साल चले केस के बाद अब उनकी याचिका पर फैसला आया और रिटायरमेंट के बाद वह प्रमोट हो गए। जिसमें पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने उन्हें करीब 27 साल बाद सीनियोरिटी और प्रमोशन के लाभ देने के आदेश दिए। हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि पेंशन और रिटायरमेंट में मिलने वाले बैनिफिट का दोबारा हिसाब कर बकाया भी दिया जाए। ये केस विभाग में हुई भर्ती के दौरान सरपल्स कर्मचारियों को एडजस्ट करते वक्त सीनियोरिटी को नजरअंदाज करने से जुड़ा है। जिसमें हाईकोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि सरप्लस कर्मचारियों को नौकरी में एडजस्ट करते वक्त प्रायोरिटी दे सकते हैं लेकिन मेरिट में ऊपर नहीं रख सकते। कोर्ट ने सरकार को 2 महीने का टाइम दिया है। ऐसे शुरू हुआ पूरा विवाद पंजाब स्टेट प्लानिंग बोर्ड ने 16 अप्रैल 1991 को टेक्निकल असिस्टेंट के पदों पर 100% सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। इसके लिए MA की योग्यता रखी गई थी। विभागीय नियम 10 के अनुसार, सीधी भर्ती से नियुक्त कर्मचारियों की आपसी सीनियोरिटी चयन बोर्ड की परीक्षा में मिले अंकों के आधार पर तैयार मेरिट लिस्ट से तय होनी थी। विज्ञापन के बाद सरकार ने 14 मई 1991 को निर्देश दिए कि सीधी भर्ती से पहले उद्योग विभाग के सरप्लस कर्मचारियों को इन पदों पर समायोजित किया जाए। याचिकाकर्ता नैब सिंह और अन्य इस प्रक्रिया के लिए योग्य थे, लेकिन विभागीय गलती से उनके नाम समय पर सरप्लस सूची में नहीं भेजे गए। बाद में उनके नाम रोजगार कार्यालय के जरिए भेजे गए, जबकि उनसे जूनियर कर्मचारियों के नाम पहले ही सरप्लस कर्मचारी के तौर पर भेजे जा चुके थे। ज्यादा अंक वाले नीचे, कम अंक वालों को प्रमोशन
चयन प्रक्रिया पूरी होने पर सामने आया कि याचिकाकर्ताओं ने संबंधित जूनियर कर्मचारियों से ज्यादा अंक हासिल किए थे। इसके बावजूद 25 नवंबर 1999 को कम अंक वाले जूनियर कर्मचारियों को रिसर्च अफसर के पद पर प्रमोशन दे दिया गया। इसके बाद 11 अगस्त 2000 को जारी सीनियोरिटी लिस्ट में भी याचिकाकर्ताओं को उन्हीं कर्मचारियों से नीचे रखा गया। सरकार का तर्क था कि ये कर्मचारी सरप्लस श्रेणी से आए थे और उन्हें पहले एडजस्ट किया गया था, इसलिए वे सीनियर माने जाएंगे। याचिकाकर्ताओं ने सीनियोरिटी लिस्ट और प्रमोशन को चुनौती देते हुए 2001 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने 14 सितंबर 2001 को मामले में नोटिस जारी किया। केस चलता रहा, कर्मचारी रिटायर हो गए
मामला करीब 25 साल तक हाईकोर्ट में लंबित रहा। इस दौरान याचिकाकर्ताओं को बाद में रिसर्च ऑफिसर पद पर प्रमोशन तो मिला, लेकिन 25 नवंबर 1999 से मिलने वाली सीनियोरिटी और उससे जुड़े वित्तीय लाभ नहीं मिले। आखिरकार फैसला आने से पहले ही सभी याचिकाकर्ता अपनी पूरी नौकरी कर सेवानिवृत्त हो गए। 3 सितंबर 2026 को आया फैसला
3 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सरप्लस कर्मचारियों को नौकरी में समायोजन के दौरान प्राथमिकता दी जा सकती है, लेकिन नियुक्ति के बाद उनकी वरिष्ठता भर्ती नियमों के खिलाफ तय नहीं की जा सकती। जब याचिकाकर्ताओं की मेरिट अधिक थी, तो उन्हें जूनियर नहीं माना जा सकता। सिर्फ सरप्लस कर्मचारी होने के आधार पर किसी को मेरिट में ऊपर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने 11 अगस्त 2000 की वरिष्ठता सूची और 25 नवंबर 1999 को जूनियर कर्मचारियों को दिए गए प्रमोशन आदेश रद्द कर दिए। सरकार को याचिकाकर्ताओं को 25 नवंबर 1999 से वरिष्ठता और प्रमोशन का लाभ देने का आदेश दिया गया है। साथ ही पेंशन और रिटायरमेंट लाभों का दोबारा हिसाब कर 2 महीने के भीतर एरियर का भुगतान करने को कहा गया है।